देहरादून में जलवायु अनुकूल विकास पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन, विशेषज्ञों ने रखे विचार

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(देहरादून) — दो दिवसीय National Consultation on Collaborative Action for Climate Resilience सम्मेलन का सफल आयोजन देहरादून में किया गया। इस सम्मेलन में 80 से अधिक विशिष्ट प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें उत्तराखंड योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री राज शेखर जोशी, आईएमडी देहरादून के प्रतिनिधि, दून विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, पर्यावरणविद, भूवैज्ञानिक, विद्यार्थी और समुदाय के प्रतिनिधि शामिल रहे।

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यह सम्मेलन HIMAD, DKD, AMAN, HESCO और TPVS जैसे पांच प्रमुख संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व डॉ. पुंडीर ने किया। मुख्य विषयों में स्थानीय अनुकूलन प्रथाओं को सशक्त बनाना, आपदा प्रबंधन रणनीतियों को आगे बढ़ाना और कार्बन संचयन पहल को बढ़ावा देना शामिल था।

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कार्यक्रम के दौरान DKD द्वारा “Comprehensive Documentation and Innovative Research Action on Climate Change Prevention, Mitigation & Adaptation Strategies for a Climate Resilient Uttarakhand” शीर्षक से एक विस्तृत दस्तावेज़ भी जारी किया गया।

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श्री राज शेखर जोशी ने शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चिंता जताई तथा ईको-क्लब विकास और रणनीतिक योजना को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।

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प्रो. कुसुम अरुणाचलम (दून विश्वविद्यालय) ने वन पारिस्थितिकी तंत्र और क्षतिग्रस्त वनों के पुनर्वास की आवश्यकता पर चर्चा की, वहीं प्रो. वीरेन्द्र पैंल्यू ने स्थानीय समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को जलवायु नीतियों में शामिल करने की वकालत की।

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तकनीकी सत्र में डॉ. पल्लवी, प्रो. एम.एस. पंवार और डॉ. गौरव ने “Understanding the Impact of Climate Change – Dimensions, Dynamics, and Evidence” विषय पर शोध प्रस्तुत किया। इन सत्रों में केदारनाथ और जोशीमठ जैसी आपदाओं के उदाहरणों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के जमीनी प्रभावों पर प्रकाश डाला गया।

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TDH Germany (North India) के श्री मो. सलीम ने पारिस्थितिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं पर्यावरणविद श्री रघु तिवारी ने बताया कि इस वर्ष मानसून की असामान्य अवधि और पश्चिमी विक्षोभों का अगस्त में आगमन जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी है।

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डॉ. मोहन पंवार ने बताया कि जलवायु अनुकूल कृषि परियोजनाओं के कारण किसान अब वर्षा आधारित क्षेत्रों में भी 16–17 फसलें उगा रहे हैं, जो कृषि स्थिरता और विविधता का संकेत है।

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सम्मेलन का समापन इस आह्वान के साथ हुआ कि राज्य जलवायु कार्य योजना (State Climate Action Plan) में स्थानीय जलवायु चिंताओं और पारंपरिक ज्ञान को प्राथमिकता दी जाए, ताकि सामुदायिक सहभागिता के साथ उत्तराखंड एक जलवायु-सक्षम और सतत राज्य बन सके।

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