दस दिवसीय थिएटर कार्यशाला के बाद अल्मोड़ा लिटरेचर फेस्टिवल में बच्चों ने नुक्कड़ नाटकों के जरिए उठाए सामाजिक मुद्दे
प्रखर गोयल | अल्मोड़ा
हर बच्चे के भीतर एक कहानी होती है, कुछ सवाल होते हैं और अपनी बात कहने की इच्छा भी। लेकिन कई बार बच्चों को यह पता नहीं होता कि अपनी भावनाओं और विचारों को किस तरह व्यक्त किया जाए। इसी अभिव्यक्ति को एक मंच देने की पहल अल्मोड़ा के दीनापानी स्थित अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज में देखने को मिली, जहां विद्यार्थियों के साथ दस दिवसीय थिएटर कार्यशाला आयोजित की गई।
डिजी धारा फाउंडेशन और सूरजमुखी फाउंडेशन के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों को केवल अभिनय सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी रचनात्मकता पहचानने, भावनाओं को समझने और अपनी बात कहने का आत्मविश्वास विकसित करने का अवसर देना था।
‘थिएटर ऑफ द ऑपप्रेस्ड’ की अवधारणा पर आधारित इस कार्यशाला में बच्चों को रंगमंच के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले इन विद्यार्थियों के लिए अभिव्यक्ति के ऐसे माध्यमों से परिचित होना एक नया अनुभव था। कार्यशाला के दौरान उन्हें अपनी झिझक से बाहर निकलने, कल्पनाओं को सामने लाने और सामूहिक रूप से सीखने का अवसर मिला।
कार्यशाला में डिजी धारा फाउंडेशन की संस्थापक बुशरा रहमान, सूरजमुखी फाउंडेशन के संस्थापक अक्षय तिवारी तथा कात्यायनी पांडे और श्रेया अरोड़ा ने सहभागिता की। दस दिनों तक चले इस प्रयास के बाद बच्चों को अपनी सीख और रचनात्मकता को सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर अल्मोड़ा लिटरेचर फेस्टिवल में मिला।
30 और 31 अक्टूबर तथा 1 नवंबर को आयोजित तीन दिवसीय महोत्सव के दौरान बच्चों ने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से सामाजिक जागरूकता का संदेश दिया। उनकी प्रस्तुतियों में मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक संकोच और महिलाओं के संघर्ष जैसे विषय शामिल रहे। रंगमंच के माध्यम से बच्चों ने उन मुद्दों को उठाया, जिन पर समाज में अक्सर खुलकर बातचीत नहीं होती।
अल्मोड़ा लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्य, कला, संगीत, पत्रकारिता और सामाजिक विषयों पर संवाद के बीच सरकारी विद्यालय के बच्चों की यह भागीदारी विशेष महत्व रखती है। विद्यार्थियों को एक ऐसे मंच पर अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करने का अवसर मिला, जहां उनकी आवाज व्यापक दर्शकों तक पहुंच सकी।
डिजी धारा फाउंडेशन और सूरजमुखी फाउंडेशन की इस पहल ने यह संदेश दिया कि रचनात्मकता किसी विशेष संसाधन या परिवेश की मोहताज नहीं होती। जरूरत है तो अवसर, मार्गदर्शन और ऐसे मंच की, जहां बच्चों को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता मिले।
महोत्सव का उद्घाटन कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने किया। तीन दिवसीय आयोजन में साहित्य, कला, संगीत, पत्रकारिता और समावेशी शिक्षा सहित विभिन्न विषयों पर संवाद हुआ।
दीनापानी के सरकारी विद्यालय से निकली यह पहल रंगमंच की उस भूमिका को सामने लाती है, जिसमें कला केवल प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आत्मविश्वास, संवाद और सामाजिक संवेदनशीलता विकसित करने का माध्यम बनती है।
कभी-कभी बच्चों को कुछ नया सिखाने से अधिक जरूरी होता है, उन्हें यह अवसर देना कि वे खुद को पहचान सकें और अपनी बात कहने का साहस जुटा सकें।
